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Monday, May 23, 2011

रास्ते वाले अमलतास

मै रोज देखता था उन्हें
गुजरते हुए उस रास्ते से
जो जाता था हॉस्पिटल से कॉलेज तक

सुबह सुबह बहुत जल्दी में
और लौटते हुए बहुत आराम से
कि दोनों तरफ
रास्ते के
कतार लगी है
फूलों से लदे
बहुत खुबसूरत अमलतास की

और खुश हो जाता था
मन ही मन
उनकी पीत आभा देखकर

फिर
एक दिन मौके से
हाथ बढाकर
तोड़ लिया एक गुच्छा
बहुत फब रहा था
वो मेरे हाथ में
अँगुलियों के बीच
उसकी अधखिली कलियाँ
बिलकुल पीले कमल की कलियों ka
chota pratiroop सी लग रही थी
जो तस्वीर में देखीं थी
बहुत बार
वैदेही या धन देवी के hathon में

और फिर
धीरे से
ले गया उसे
चेहरे के पास
और एक गहरी सांस ली
पर
उन खुबसूरत फूलों में
कोई खुशबू नहीं थी
का छोटा प्रतिरूप

Thursday, April 21, 2011

हे प्रिय सुनो !

हे प्रिय सुनो !





आज पूरे सत्य को





और छोड़ दो ग्लानि





मुझे स्वीकार न करने की





अगर कोई हो तो





हे प्रिय !





मुझे दुःख है कि





बिना जाने ही मैंने





तुम्हें





इजहार कर दिया





पर प्रिय





मुझे वो भाव





प्रेम ही जान पड़ा था





हे प्रिय !





सुना था कि





मित्रता प्रेम में बदलती है





पर





यहाँ थोड़ा





अलग हुआ





मेरी मित्रता और प्रेम ने





तुम्हारे लिए





साथ ही जन्म लिया





और मैंने इसे





प्रथम दृष्टिय प्रेम मान लिया





बिना तुम्हें नज़दीक से जाने ही





क्योंकि प्रेम यही होता है





ऐसा सुना था





पर प्रिय !





फिर मैंने तुम्हें जाना





धीरे धीरे





और प्रेम परास्त हो गया





एवं हमारी मित्रता





गहरी होती चली गयी





परिचय के साथ साथ





हे प्रिय !





माफ़ करना कि





तुम्हें लेकर





मैंने जीवन के स्वप्न संजोये





पर प्रिय





अब लगता है कि





मेरे जीवन का लक्ष्य तुम नहीं हो





माफ़ करना प्रिय





तुम्हें जीवन संगिनी समझा





पर प्रिय





अब तुम्हें जीवन भर की





सखी समझता हूँ





और विश्वास करो प्रिय





यह भाव मुझे





अधिक संतुष्ट करता है





बजाय उसके





जो तुम्हें बिना जाने ही





बुन लिए थे मैंने





पर प्रिय





इस रिश्ते को मत तोड़ना





तुम प्रिय थी





प्रिय हो





एवं सदैव रहोगी





पर हमारा प्रेम





साख्य भाव का है





न कि काम भाव का





कृष्ण राधा न सही





पर कृष्ण कृष्णा की तरह





Monday, December 27, 2010

आंसू

सिर्फ आंसूओं से नहीं कभी प्रायश्चित होता
पछताने भर से बीता समय नहीं लौटता
अपनी कल्पनाओं पर हम कभी मंद मंद मुस्काते थे
पर हाय आज वही हमें देख ठठाकर हंस रही है
क्या ये सच है संसार में कोई अपना नहीं होता
मोह माया में फंसा इंसान कुछ नही कर सकता
वो आलस्य था या कि वित्रिसना ही रही होगी
कि जल जहर में जलते गलते ख़त्म हो गये
अब क्या फायदा गलतियाँ गिनाने का
जब सब चरण पूर्णरूपेण niश्पादित हो गये
माना अब भी वक्त है तुम्हारे पास
पर जो आगे निकल गये वो तो निकल ही गये
हम कभी आगे थे उनसे
वो भी एक वक्त था
आज वो चोटियों पर है
और हम घाटियों से ताक रहे हैं

क्या जिंदगी जीने में इतने मग्न हो गये
कि जिंदगी सुनहरी करने के सब स्वप्न, स्वप्न रह गये
पर क्या सच जिन्दगी जी हमने ?
बस बहते रहे बहाव में
क्या इसे ही तैरना कहते हैं ?
ना, कभी तैरना तो हमने seekha ही नही
बस बहते रहे लहर में
डूबते उतरते रहे सहर में
काश कि वक्त उल्टा चलता
बीता समय पुनह मिलता
पगला गये हैं हम, अब कुछ पल्ले नहीं पड़ता
गलत राहों से मंजिल का निशाँ नहीं दिखता

आंसू, आंसू ही तो अब सहारा बन सकते हैं
इस माया मेखला को धूमिल कर सकते हैं
पर वो तो कब के ही सूख चुके हैं
या शायद अपना आस्तित्व खो चुके हैं
आंसुओं से आंसुओं तक यही हमारी कहानी है
इसमे बंद खुशियाँ क्या झूठी और बेमानी है ?

प्रश्न बहुत है पर उत्तर नहीं मिलता
मिलता है तो बस एक नया तोहफा
आंसुओं से भरा......




Monday, September 6, 2010

बन्द करो ये हत्यायें

किस धर्म में लिखा है

किसने कहा है

कौन तुम्हें प्रेरित कर रहा है

क्या तेरा दिल नहीं जानता

क्या तेरा मन नहीं मानता

क्या तू नहीं समझता

कि अत्याचार अधर्म का अवतार है

रे मनुष्य ! तू खुद को आस्तिक कहता है

रे मुर्ख ! आस्था के नाम पर बलि देता है

क्यों? आखिर कौनसी देवी है

जिसने तूझे मृत्यु हाथ में लेने दी

तूझे किसने ये स्वतंत्रता दी

कि तू किसी की जिंदगी ले

रे स्वार्थी ! क्या अँधा हे तेरा जमीर

या कि तू हाट में बेच आया है

क्यों नहीं सुनता इस मूक की पुकार

जो दर्द से तड़पकर दे रहा बद्दुआ

कौनसे धर्म का खुदा या इश्वर ईलाह का

कहता है कि अत्याचार करो

कौनसे ग्रन्थ में लिखा है

कि तुम मूक मार दो

किसने यह पट्टी पढ़ा दी

कि बलि से माँ खुश होगी

अरे अपनी रचना को नष्ट होते देखकर

किसका हृदय नहीं चीत्कारता

कौन है रे जो

स्वयं के बने को बिगाडता

रे स्वार्थ में अंधे

रे स्वयं शैल में जी रहे बन्दे

पट्टी हटा ये जो लगा रखी है

खोल दिल और देख कि

दर्द औरों को भी होता है

जिंदगी सिर्फ तुझ तक ही नहीं है सीमित

ये प्रपात कहीं और भी कलकता है

सुन इनकी पुकार

जो बेजुबान है

देख इनके दर्द से तड़पते देह

क्या इतना देखकर भी तेरा दिल नहीं पिघलता

तो जलाकर स्वयं को भस्म कर ले

धरा पर बोझ वैसे ही बहुत है

एक ओर कलि की एक ओर देत्य की

जरूरत नहीं है

जो दूसरों को न जीने दे

उसे स्वयं जीने का हक़ नहीं है

जो मारता है दूसरों को

उसे मरकर भी राहत नहीं है

बस याद रखना है तो

बस एक बात याद रखना

जो बोयेगा वो कटेगा

जैसा देगा वैसा पायेगा

समझ ले बस यही धर्म का सार है

सब कुछ उस दिव्य के नियमानुसार है

Thursday, March 4, 2010

वसंत - इंतजार का अंत

शून्य , शून्य अनंत शून्य
और नितांत खालीपन
पत्रविहीन पुष्पविहीन
पतझड़ में पड़ा पेड़
इंतजार वसंत का
अनादि अनंत का
इंतजार - इंतजार
वक्त पे आयी बहार
वृक्ष का वसंत से
इंतजार के अंत से
हो रहा मधुर मिलन



चांदनी का चाँद भी
हंस रहा
रैन का श्रृंगार भी
दमक रहा
सहर का सुन्दर सूर्य
गगन में गुपचुप आ गया
तम के तीक्ष्ण तन का अंत
खुशियों का हुआ है जन्म .............

Wednesday, March 3, 2010

मिल ही जाएगी

भले ही असीम अँधेरा हो

पर रोशनी की एक राह तो

मिल ही जाएगी

अविश्वास के इस मरूस्थल में

विश्वास की एक नदी

मिल ही जाएगी

दानवों के इस दर्दे दंगल में

फ़रिश्ते सी कोई आत्मा

मिल ही जाएगी

हमें इंतजार है तो बस इस ज्वार के उतरने का

किनारों की कंचन सीपियाँ

मिल ही जाएगी





कभी न कभी तो वह वक्त आएगा ही

जब इस ठूंठ पर भी

पत्तों के संग रंग बिरंगे पुष्पों का समां छाएगा ही

प्रतीक्षा के इस प्रताड़ित दरिये में
धैर्य की एक नाव है
भूत की उस किनारे से
मंझधार वर्तमान का तूफ़ान सहना है
इस तरह हमें भविष्य का सफ़र तय करना है